यूपी चुनाव: क्या ये ‘हिंदुत्व’ को ‘सामाजिक न्याय’ की चुनौती है?

बात 1990 की है. 25 सितंबर को लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर से रथ यात्रा की शुरुआत की थी. उससे ठीक एक महीने पहले अगस्त में तब के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का ऐलान किया था. वीपी सिंह की घोषणा ने बीजेपी को सकते में डाल दिया था.

बीजेपी के नेता देश की राजनीति में जाति की पेचीदगियों को समझते हैं, और तब भी समझते थे. मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के दूरगामी राजनीतिक असर की काट के लिए बीजेपी ने उस वक़्त ‘हिंदू एकता’ का नारा देते हुए राम मंदिर का आंदोलन तेज़ कर दिया था.

अब बात 2022 की.

शुक्रवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से जो तस्वीरें सामने आई उसने एक बार फिर 1990 की यादें ताज़ा कर दी है.पिछले कुछ दिनों से बीजेपी से बगावत कर जाने वाले मंत्रियों और विधायकों की झड़ी से लग गई है. आज उनमें से कई नेताओं ने समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर ली है. रही सही कसर उन अटकलों ने पूरी कर दी जिसमें कहा जा रहा है योगी आदित्यनाथ अयोध्या से चुनाव लड़ सकते हैं. हालांकि इस बात पर आधिकारिक मुहर नहीं लगी है.

मंदिर’ बनाम ‘मंडल’

चुनाव से पहले एक फ्रेम में इतने सारे पिछड़े वर्ग के नेताओं का मिलन को कुछ जानकार ‘मेला होबे’ करार दे रहे हैं, तो कुछ बंगाल चुनाव की तर्ज़ पर ‘खेला होबे’ की बात कह रहे हैं.

लेकिन जिन जानकारों ने 1990 के दशक में उस राजनीति को देख और आज भी देख रहे हैं – उनको लगता है कि इतिहास एक बार फिर से ख़ुद को दोहरा रहा है.

सवर्ण’ बनाम ‘पिछड़ा’

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार नागेंद्र प्रताप, नीरजा चौधरी की इस बात से सहमत हैं कि बीजेपी का अयोध्या कार्ड इस बार नहीं चलेगा.लेकिन उनकी राय में इस बार का चुनाव ‘मंदिर’ बनाम ‘मंडल’ नहीं बल्कि ‘सवर्ण’ बनाम ‘पिछड़ा’ होने की संभावना ज़्यादा है.

ब्राह्मणों की नाराज़गी

सभी पिछड़े समाजवादी पार्टी में नहीं जाएंगे, नीरजा चौधरी की बात से वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव भी सहमत दिखते हैं.

अनिल यादव लगभग तीन दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति को कवर करते रहे है.बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “मंडल, मंदिर और हिंदुत्व के बीच ब्राह्मणों की नाराज़गी ने बीजेपी की चिंताएं ज़्यादा बढ़ा दी है.हालांकि ये भी सच है कि बीजेपी में मची भगदड़ में बहुत ज़्यादा ब्राह्मण नेताओं ने साथ नहीं छोड़ा है.

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