किस्सा व्लादिमीर पुतिन का: मीडिया पर नजर रखने वाला केजीबी एजेंट कैसे बन गया विश्व मीडिया की सुर्खियां

Russia Ukraine War: बर्लिन की जिस दीवार के गिरने से यूएसएसआर के पतन की शुरुआत हुई थी, उसी ढहती हुई दीवार ने व्लादिमीर पुतिन को ऐसी उछाल दी, जिसने केजीबी के सीक्रेट एजेंट को देखते ही देखते रूस का राष्ट्रपति बना दिया। एक ऐसा राष्ट्रपति जो आज दुनिया भर के खबरों में छाया हुआ है।

9 नवंबर 1989…पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के बीच बनाई गई बर्लिन की दीवार, दोनों ओर के आम नागरिकों ने गिरा दी, और पूर्वी जर्मनी का कम्युनिस्ट शासन देखता रह गया…इस घटना ने जहां पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी को एक कर दिया, वहीं यूएसएसआर (USSR) के पतन की शुरुआत भी कर दी…मगर इतिहास की इसी तारीख ने रूस के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति के उदय की नींव भी रख दी थी…वो शख्स कोई और नहीं बल्कि मौजूदा रशियन प्रेसीडेंट व्लादिमीर पुतिन थे…इधर बर्लिन की दीवार गिरी और उधर पूर्वी जमर्नी के ड्रेसडन में बतौर केजीबी एजेंट तैनात पुतिन ने वापस अपने शहर सेंट पीटर्सबर्ग का रुख कर लिया…पुतिन की राजनीतिक छवि को चमकाने में उनके समर्थकों ने केजीबी एजेंट वाली उनकी भूमिका का जमकर इस्तेमाल किया है।

किस तरह की जासूसी करते थे पुतिन?

व्लादिमीर पुतिन की जीवनी लिखने वाले लेखक माशा गेसन अपनी किताब “मैन विदआउट अ फेस, द अनलाइकली राइज ऑफ व्लादिमीर पुतिन” में लिखते हैं कि “23 साल की उम्र में केजीबी ज्वाइन करने वाले पुतिन के कई जासूसी किस्से उनके समर्थक सुनाते हैं, मगर जो दस्तावेज उपलब्ध हैं, उसके मुताबिक पूर्वी जमर्नी में पुतिन का काम महज प्रेस क्लिपिंग जमा करना और स्थानीय मीडिया पर नजर रखने भर का था, उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी गई थी…”

पुतिन की ऊंची उड़ान

लौटते हैं 1990 के दशक में जहां, सेंट पीटर्सबर्ग आकर पुतिन ने म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में अहम जिम्मेदारी निभाई…उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जांच हुई और आरोप सही साबित हुए, मगर सेंट पीटर्सबर्ग के तत्कालिन मेयर अनाटोली सोबचाक से अच्छे संबंधों के चलते पुतिन का बाल भी बांका नहीं हुआ। इसके बाद तो पुतिन राजनीति में ऊपर की ओर चढ़ते चले गए। 1997 में तब के रशियन प्रेसीडेंट बोरिस येल्तसिन ने उन्हें रूस का प्रधानमंत्री बनाया। फिर जब येल्तसिन ने अचानक ही राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया, तो पुतिन कार्यवाहक राष्ट्रपति बन गए… इस पद पर उन्होंने सबसे पहला काम यह किया कि येल्तसिन पर लगे भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से उन्हें मुक्त कर दिया।

पुतिन और रूस के अच्छे दिन

2000 में पुतिन 53 प्रतिशत वोटों के साथ देश के राष्ट्रपति चुने गए… उनकी जीत में उनकी ‘इमेज’ ने एक बड़ी भूमिका निभाई। अपने बाकी के प्रतिद्वंद्वियों से अलग पुतिन कानून और व्यवस्था को मानने वाले उम्मीदवार के रूप में उभरे। ये वो दौर था, जब रूस भ्रष्टाचार से परेशान था, ऐसे में देशवासियों को पुतिन में एक उम्मीद की किरण दिखाई दी और वे इस उम्मीद पर खरे भी उतरे… उन्होंने देश को आर्थिक संकट से बाहर निकाला। देश ने आर्थिक रूप से जो अच्छे दिन देखे, उसने पुतिन की लोकप्रियता को और भी बढ़ा दिया। नतीजा ये हुआ कि 2004 में लोगों ने एक बार फिर उन्हें अपना नेता चुन लिया।

सत्ता पर मजबूत पकड़

अमेरिका की तरह रूस में भी राष्ट्रपति लगातार तीसरी बारी नहीं चुना जा सकता। लिहाजा दिमित्री मेद्वेदेव देश के राष्ट्रपति बने और उन्होंने पुतिन को अपना प्रधानमंत्री चुना। माना जाता है कि मेद्वेदेव केवल कागजों पर ही राष्ट्रपति थे, जबकि देश की कमान असल में पुतिन के ही हाथों में थी। मेद्वेदेव के दौर में घोषणा हुई कि अगले चुनाव से राष्ट्रपति का कार्यकाल चार की जगह छह सालों का होगा। 2012 में पुतिन फिर राष्ट्रपति पद पर लौटे। इस बार छह सालों के लिए और इस बार उन्होंने मेद्वेदेव को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। 2018 में पुतिन एक बार फिर सत्ता में आ गए हैं। इस बार रिकॉर्ड 75 फीसदी वोटों के साथ। उनके सामने कोई भी कड़ा प्रतिद्वंद्वी नहीं खड़ा था… ऐसे में चुनाव से पहले ही उनकी जीत तय मानी जा रही थी।

किसने कहा पुतिन को माफिया?

अपनी किताब “मैन विदआउट अ फेस, द अनलाइकली राइज ऑफ व्लादिमीर पुतिन” में लेखक माशा गेसन लिखते हैं कि “पुतिन माफिया के रूप में सरकार चला रहे हैं… पश्चिम में उन्हें “बॉन्ड का विलन” भी कहा जाता है…मगर रूस में उन्हें इस छवि का फायदा मिला है और अब वे कम से कम 2024 तक इस छवि को बरकरार रख सकते हैं।”

Advertisements