पुलिस FIR ना दर्ज करें तो क्या करें : जाने अपने कानूनी अधिकार

लखनऊ,कोई भी व्यक्ति पुलिस के पास अपनी शिकायत लिखित या मौखिक तौर पर दर्ज करवा सकता है |हर व्यक्ति को इस बात का अधिकार है. लेकिन अक्‍सर पुलिस ऐसा करने से इनकार कर देती है|भारतीय कानून के तहत हर आम नागरिक को कुछ ऐसे अधिकार दिए गए हैं जिनका प्रयोग करके वो एफआईआर दर्ज न होने की स्थिति में शिकायत दर्ज करा सकता है |अगर पुलिस आपकी एफआईआर को फाइल करने से ना कर देती है तो आपके पास उसके बाद भी अपनी एफआईआर को दर्ज कराने के कई रास्‍ते हैं| हमारे संवाददाता ने लखनऊ उच्च न्यायलय एक वरिष्ठ अधिवक्ता रवि शंकर सिंह से बात की जिन्होंने इसके बारे में विस्तार में बताया |

कोई भी व्यक्ति पुलिस के पास अपनी शिकायत लिखित या मौखिक तौर पर दर्ज करवा सकता है | हर व्यक्ति को इस बात का अधिकार है. लेकिन अक्‍सर पुलिस ऐसा करने से इनकार कर देती है |अगर पुलिस आपकी शिकायत को दर्ज करने से इनकार कर देती है तो आपके पास अधिकार है कि आप किसी सीनियर ऑफिसर के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं|अगर इसके बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं होती है तो आप CrPC के सेक्शन 156 (3) के तहत मेट्रोपॉलिटिन मजिस्ट्रेट के पास इसकी शिकायत करने के अधिकारी हैं|आपकी शिकायत पर मजिस्ट्रेट पुलिस को FIR दर्ज करने के निर्देश देने का अधिकार रखते हैं |

यदि कोई अधिकारी आपकी एफआईआर लिखने से मना करता है या एफआईआर दर्ज नहीं करता है तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अनुसार उन पर एक्शन लिया जा सकता है|सीआरपीसी की धारा 154 (3) के अनुसार यदि कोई पुलिस अधिकारी प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार करता है तो लिखित रूप में और डाक द्वारा संबंधित पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजी जा सकती है। यदि अधीक्षक संतुष्ट है कि अधीनस्थ पुलिस अधिकारी अनुचित रूप से प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर रहा है तो अधीक्षक या तो स्वयं मामले की जांच करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा जांच करने का निर्देश देगा।

यदि पुलिस तंत्र प्राथमिकी दर्ज नहीं करता है तो न्यायिक मजिस्ट्रेट को सीधे शिकायत दी जा सकती है। सीआरपीसी की धारा 190 के साथ पठित धारा 156 (3) में प्रावधान है कि एक आवेदन न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट को भेजा जा सकता है जिसमें पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की जा सकती है |सुरेश जैन बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी का कर्तव्य है कि वह प्राथमिकी दर्ज करे। इसके अलावा, साथ ही शिकायतकर्ता को दर्ज की गई प्राथमिकी की एक मुफ्त प्रति प्राप्त करने का अधिकार है।

ललिता कुमारी बनाम यूपी सरकार और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकी दर्ज करने के लिए आठ दिशानिर्देशों जारी किये है। उसी मामले में, SC ने महत्वपूर्ण रूप से टिप्पणी की कि यदि यह स्पष्ट है कि एक संज्ञेय अपराध किया गया है, तो पुलिस को किसी भी प्रकार की प्रारंभिक जांच करने की आवश्यकता नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रारंभिक जांच केवल यह निर्धारित करने की सीमा तक वैध है कि किया गया अपराध संज्ञेय है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने उन मामलों का भी उल्लेख किया जिनमें पुलिस द्वारा पारिवारिक विवादों, वाणिज्यिक अपराधों, चिकित्सा लापरवाही के मामलों, भ्रष्टाचार के मामलों और असामान्य देरी वाले मामलों में प्रारंभिक जांच की जा सकती है |

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